चौक, डस्टर और अनिश्चित भविष्य: देश के अतिथि
चौक, डस्टर और अनिश्चित भविष्य: देश के अतिथि शिक्षकों की अनदेखी दास्तान
कक्षा में प्रवेश करते ही बच्चों के चेहरे पर खिली मुस्कान किसी भी शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी होती है। हाथ में सफेद चाक और सामने ब्लैकबोर्ड लिए जब एक शिक्षक खड़ा होता है, तो वह केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करा रहा होता, बल्कि देश की नई पीढ़ी की नींव रख रहा होता है। लेकिन क्या कभी किसी ने उस शिक्षक की जेब और उसके भविष्य की ओर देखा है? हमारे सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बन चुके ‘अतिथि शिक्षक’ (Guest Teachers) आज इसी सवाल के बोझ तले जी रहे हैं।
एक स्थायी शिक्षक की तरह ही वे सुबह प्रार्थना सभा से लेकर शाम की घंटी तक पूरी निष्ठा से पढ़ाते हैं। परीक्षा की कॉपियां जांचना हो, खेलकूद का आयोजन हो या चुनाव से लेकर जनगणना जैसी गैर-शैक्षणिक ड्यूटी—अतिथि शिक्षक हर मोर्चे पर आगे रहते हैं। अंतर बस इतना है कि महीने के अंत में मिलने वाला मानदेय एक कुशल मजदूर के वेतन से भी कम बैठता है, और सिर पर हर वक्त ‘कल हटा दिए जाने’ की तलवार लटकी रहती है।
'समान काम, समान वेतन' का सपना
अतिथि शिक्षकों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उनसे जिम्मेदारियां पूरी मांगी जाती हैं, लेकिन अधिकार शून्य दिए जाते हैं। एक ही स्कूल के दो कमरों में दो शिक्षक एक जैसा विषय पढ़ाते हैं; एक को नियमित वेतन, भत्ते, मेडिकल सुविधाएं और पेंशन की सुरक्षा मिलती है, जबकि दूसरे को सिर्फ उस दिन का पैसा मिलता है जिस दिन उसने हाजिरी लगाई।
गर्मी की छुट्टियां, सर्दी की छुट्टियां या त्योहार जहां बाकी समाज के लिए राहत और उत्सव लेकर आते हैं, वहीं एक अतिथि शिक्षक के लिए ये छुट्टियां आर्थिक तंगी की दस्तक होती हैं। "नो वर्क, नो पे" के बेरहम नियम के कारण इन महीनों में उनका चूल्हा जलना भी मुश्किल हो जाता है।
मानसिक तनाव और सामाजिक सम्मान की लड़ाई
उच्च शिक्षा प्राप्त, एम.ए., एम.एससी., बी.एड., नेट (NET) और टीईटी (TET) जैसी कठिन परीक्षाएं पास करने के बाद जब कोई युवा इस उम्मीद से शिक्षण व्यवस्था में आता है कि कभी उसका काम देखा जाएगा, तो बदले में उसे हर नए सत्र में री-अपॉइंटमेंट की लंबी लाइनों और दफ्तरों के चक्करों में झोंक दिया जाता है।
हर साल यह डर बना रहता है कि क्या अगली तिमाही में उन्हें स्कूल में रखा जाएगा? इस निरंतर असुरक्षा ने हजारों शिक्षकों को गहरे अवसाद और मानसिक तनाव में धकेल दिया है। समाज में शिक्षक को 'गुरु' का दर्जा तो दिया जाता है, लेकिन जब वही गुरु अपने परिवार की बुनियादी जरूरतों के लिए उधार मांगने को मजबूर हो जाए, तो व्यवस्था के खोखलेपन पर तरस आता है।
व्यवस्था की सुविधा या युवाओं की मजबूरी?
सरकारों के लिए अतिथि शिक्षक व्यवस्था एक सस्ता विकल्प बन चुकी है। बजट बचाने के नाम पर नियमित नियुक्तियों को सालों-साल टाला जाता है और रिक्त पदों को नाममात्र के मानदेय पर अतिथि शिक्षकों से भर लिया जाता है। यह शिक्षा के अधिकार और युवा प्रतिभा दोनों के साथ एक खुला अन्याय है।
एक शिक्षक जिसका खुद का भविष्य सुरक्षित नहीं है, वह विद्यार्थियों के भविष्य को कितनी निश्चिंतता से संवार पाएगा? शिक्षा केवल एक सर्विस डिलीवरी नहीं है, यह एक साधना है। और साधना के लिए मानसिक स्थिरता सबसे पहली शर्त होती है।
अब समय आ गया है कि नीतियों की फाइलों से बाहर निकलकर इन शिक्षकों की जमीनी हकीकत को देखा जाए। नियमितीकरण की एक पारदर्शी नीति, सम्मानजनक वेतन और बुनियादी सामाजिक सुरक्षा कोई खैरात नहीं, बल्कि उस परिश्रम का वाजिब हक है जो ये शिक्षक रोज स्कूल की चारदीवारी में पसीना बहाकर देते हैं। जब तक शिक्षक का जीवन सम्मानजनक और सुरक्षित नहीं होगा, तब तक देश की शिक्षा व्यवस्था को सशक्त बनाने के सारे दावे अधूरे ही रहेंगे।

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