चौक, डस्टर और अनिश्चित भविष्य: देश के अतिथि
चौक, डस्टर और अनिश्चित भविष्य: देश के अतिथि शिक्षकों की अनदेखी दास्तान कक्षा में प्रवेश करते ही बच्चों के चेहरे पर खिली मुस्कान किसी भी शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी होती है। हाथ में सफेद चाक और सामने ब्लैकबोर्ड लिए जब एक शिक्षक खड़ा होता है, तो वह केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करा रहा होता, बल्कि देश की नई पीढ़ी की नींव रख रहा होता है। लेकिन क्या कभी किसी ने उस शिक्षक की जेब और उसके भविष्य की ओर देखा है? हमारे सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बन चुके ‘अतिथि शिक्षक’ (Guest Teachers) आज इसी सवाल के बोझ तले जी रहे हैं। एक स्थायी शिक्षक की तरह ही वे सुबह प्रार्थना सभा से लेकर शाम की घंटी तक पूरी निष्ठा से पढ़ाते हैं। परीक्षा की कॉपियां जांचना हो, खेलकूद का आयोजन हो या चुनाव से लेकर जनगणना जैसी गैर-शैक्षणिक ड्यूटी—अतिथि शिक्षक हर मोर्चे पर आगे रहते हैं। अंतर बस इतना है कि महीने के अंत में मिलने वाला मानदेय एक कुशल मजदूर के वेतन से भी कम बैठता है, और सिर पर हर वक्त ‘कल हटा दिए जाने’ की तलवार लटकी रहती है। 'समान काम, समान वेतन' का सपना अतिथि शिक्षकों की सबसे बड़ी विडंबन...